कृष्ण का संपूर्ण व्यक्तित्व आनंदित करने वाला है. कृष्ण को संपूर्ण अवतार माना जाता है, जो सोलह कलाओं से युक्त है. सोलह कलाओं का अर्थ अपने आप में गहरे भेद समेटे हुए है. वस्तुतः चन्द्रमा के सोलह आकर, पूर्णिमा और अमावस्या के बीच के स्वरूप को जीवन के सौंदर्य से देखा गया है.

What makes Krishna a Complete Avatar?

कृष्ण का संपूर्ण व्यक्तित्व आनंदित करने वाला है. कृष्ण को संपूर्ण अवतार माना जाता है, जो सोलह कलाओं से युक्त है. सोलह कलाओं का अर्थ अपने आप में गहरे भेद समेटे हुए है. वस्तुतः चन्द्रमा के सोलह आकर, पूर्णिमा और अमावस्या के बीच के स्वरूप को जीवन के सौंदर्य से देखा गया है.

चन्द्रमा जहाँ पृथ्वी पर निशा काल में प्रकाश का स्त्रोत है वहीँ, कला और सौंदर्य का बिम्ब भी है. चाँद और चकोर के प्रेम का चित्रण हो अथवा, चंद्रमा और पृथ्वी के प्रेम की रसधारा, प्रेमिका की सुन्दरता की अभिव्यक्ति को थाम लेने की क्षमता के साथ कवियों और साहित्यकारों के लिए चन्द्रमा, सदैव आदरणीय रहा है.

कृष्ण के सोलह कलाएं, चन्द्रमा के जीवन क्रम की सोलह कलाओं का घोतक हैं. साथ ही स्त्रियों के अन्दर पिंड के निर्माण की समस्त प्रक्रिया इसी सोलह दिनों के उतार चढ़ाव के साथ, चन्द्रमा के एक मास को समाहित कर मासिक धर्म बनाती है. शरीर रूपी ऊर्जा पिंड में विभिन्न कलाओं का प्रवाह, ज्योतिषीय ऊर्जा से संचालित होता है. कला उसी प्रवाह के वैचारिक अभिव्यक्ति के मानवोचित गुणों के संवर्धन का नाम है.  कला को सामान्य भाषा में गुण या विशेषता भी कहा जा सकता है। श्रीकृष्ण  इन सभी मानवोचित गुणों के विकास क्रम के शिखर पर खड़े हैं. उनमे यह सभी गुण उचित मात्रा में समाविष्ट थे। आप इसे ह्यूमन स्पिसिज़ के सबसे बेहतर एवोल्यूशन फॉर्म के रूप में देख सकते हैं.

विष्णु के अब तक बारह अवतार हुए हैं. उनमे से सभी अवतारों में कृष्ण ही पूर्ण रूप से उदित अवतार कहे गए हैं. श्री हरी नायारण विष्णु के अब तक दस अवतार हो चुके हैं, और दो अवतार होने शेष हैं.  डार्विन ने इसी संकल्पना को चुरा कर अपने नाम से एवोल्यूशन थियोरी कहा. आप देखेंगे तो वैज्ञानिक मान्यताओं के अनुसार मनुष्य की उत्पति और विकास के क्रम में यह कहा जाता है कि जीवन एक कोशिका के प्राणी ( Unicellular Species) जैसे अमीबा से उत्क्रमित होता हुआ, पृथ्वी पर बहु कोशिका प्राणी के रूप में विकसित हुआ. पृथ्वी पर जीवों के क्रमिक विकास को मछली से लेकर मनुष्य तक की यात्रा को विज्ञान परिभाषित करता रहा है. जिसे डार्विन थियोरी ऑफ़ एवोल्यूशन के नाम से जाना जाता है.

अब तक मत्स्य, कश्यप (कच्छप अथवा कुर्म) और वराह में एक-एक कला,  नृसिंह और वामन में दो-दो और परशुराम मे तीन कलाएं बताई गई हैं। श्री राम ने बारह कलाओं के साथ अवतार लिया था। भगवान श्रीकृष्ण ही सोलह कलाओं के स्वामी माने जाते हैं। बुद्ध को अर्धवातर कहा जाता है. अर्थात बुद्ध आठ कलाओं से युक्त थे. बुद्ध के शेष अर्धवातर मैत्रेय की प्रतीक्षा कलियुग में की जा रही.

बारह या उससे अधिक कला के उदय को चन्द्र संज्ञा से सुशोभित किया जाता है. इसलिए आप रामचंद्र अथवा कृष्णचन्द्र जैसे संबोधन से सुशोभित हैं.  नरहरी नारायण विष्णु के अंतिम अवतार ‘कल्कि अवतार’ की प्रतीक्षा समस्त सनातन धर्मावलम्बियों को है. भविष्य पुराण में यह भाषित है कि कलियुग के अंतिम चरण में भगवान् कल्कि अवतार लेकर दुष्टों का सर्वनाश करेंगे. कलियुग के कुल चार चरण हैं. साथ ही यह भी भाषित है कि प्रथम चरण के समाप्त होते ही गंगा धरती से विलुप्त हो जायेगी. आप ऐसी स्थिति को घटित होते देख रहे. कला को सरल शब्दों में गुण या विशेषता भी कहा जा सकता है। भगवान् श्रीकृष्ण में मनुष्य योनी के विकास के शिखर पर होने पर अपेक्षित और संभावित सभी नैसर्गिकतायें समाविष्ट थीं. इन सोलह कलाओं का विवरण इस प्रकार है:

श्री संपदा : श्री कला से संपन्न व्यक्ति के पास लक्ष्मी का स्थायी निवास होता है। ऐसा व्यक्ति आत्मिक रूप से धनवान होता है। ऐसे व्यक्ति के पास से कोई खाली हाथ वापस नहीं आता। इस कला से संपन्न व्यक्ति ऐश्वर्यपूर्ण जीवनयापन करता है।

भू संपदा : जिसके भीतर पृथ्वी पर राज करने की क्षमता हो तथा जो पृथ्वी के एक बड़े भू-भाग का स्वामी हो, वह भू कला से संपन्न माना जाता है।

कीर्ति संपदा : कीर्ति कला से संपन्न व्यक्ति का नाम पूरी दुनिया में आदर सम्मान के साथ लिया जाता है। ऐसे लोगों की विश्वसनीयता होती है और वह लोककल्याण के कार्यों में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेते हैं।

वाणी सम्मोहन : वाणी में सम्मोहन भी एक कला है। इससे संपन्न व्यक्ति की वाणी सुनते ही सामने वाले का क्रोध शांत हो जाता है। मन में प्रेम और भक्ति की भावना भर उठती है।

लीला : पांचवीं कला का नाम है लीला। इससे संपन्न व्यक्ति के दर्शन मात्र से आनंद मिलता है और वह जीवन को ईश्वर के प्रसाद के रूप में ग्रहण करता है।

कांतिः जिसके रूप को देखकर मन अपने आप आकर्षित हो जाता हो, जिसके मुखमंडल को बार-बार निहारने का मन करता हो, वह कांति कला से संपन्न होता है।

विद्याः सातवीं कला का नाम विद्या है। इससे संपन्न व्यक्ति वेद, वेदांग के साथ ही युद्घ, संगीत कला, राजनीति एवं कूटनीति में भी सिद्घहस्त होते हैं।

विमलाः जिसके मन में किसी प्रकार का छल-कपट नहीं हो और जो सभी के प्रति समान व्यवहार रखता हो, वह विमला कला से संपन्न माना जाता है।

उत्कर्षिणि शक्तिः इस कला से संपन्न व्यक्ति में लोगों को कर्म करने के लिए प्रेरित करने की क्षमता होती है। ऐसे व्यक्ति में इतनी क्षमता होती है कि वह लोगों को किसी विशेष लक्ष्य की प्राप्ति के लिए प्रेरित कर सकता है।

नीर-क्षीर विवेक : इससे संपन्न व्यक्ति में विवेकशीलता होती है। ऐसा व्यक्ति अपने विवेक से लोगों का मार्ग प्रशस्त कर सकने में सक्षम होता है।

कर्मण्यताः इस कला से संपन्न व्यक्ति में स्वयं कर्म करने की क्षमता तो होती है। वह लोगों को भी कर्म करने की प्रेरणा दे सकता है और उन्हें सफल बना सकता है।

योगशक्तिः इस कला से संपन्न व्यक्ति में मन को वश में करने की क्षमता होती है। वह मन और आत्मा का फर्क मिटा योग की उच्च सीमा पा लेता है।

विनयः इस कला से संपन्न व्यक्ति में नम्रता होती है। ऐसे व्यक्ति को अहंकार छू भी नहीं पाता। वह सारी विद्याओं में पारंगत होते हुए भी गर्वहीन होता है।

सत्य-धारणाः इस कला से संपन्न व्यक्ति में कोमल-कठोर सभी तरह के सत्यों को धारण करने की क्षमता होती है। ऐसा व्यक्ति सत्यवादी होता है और जनहित और धर्म की रक्षा के लिए कटु सत्य बोलने से भी परहेज नहीं करता।

आधिपत्य : इस कला से संपन्न व्यक्ति में लोगों पर अपना प्रभाव स्थापित करने का गुण होता है। जरूरत पड़ने पर वह लोगों को अपने प्रभाव की अनुभूति कराने में सफल होता है।

अनुग्रह क्षमताः इस कला से संपन्न व्यक्ति में किसी का कल्याण करने की प्रवृत्ति होती है। वह प्रत्युपकार की भावना से संचालित होता है। ऐसे व्यक्ति के पास जो भी आता है, वह अपनी क्षमता के अनुसार उसकी सहायता करता है।





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