हर व्यक्ति अच्छाइयों और बुराइयों से मिश्रित होता है. महाबली रावण हालाँकि अधर्म और अन्याय का प्रतिक है, लेकिन रावण से सिखने योग्य भी बहुत कुछ है. रावण महाज्ञानी तो था ही, उसके जीवन से हमें शिक्षा भी मिलती है। वह एक कुशल राजनीतिज्ञ , महापराक्रमी , अत्यन्त बलशाली , अनेकों शास्त्रों का ज्ञाता प्रकान्ड विद्वान पंडित एवं महाज्ञानी थाविचारमीमांसा आपके लिए लेकर आया है रावण की दस ख़ास बातें, जिन्हें जानकार आप भी आश्चर्य करेंगे।

5. रावण इतना शक्तिशाली था, कि वह ग्रहों की स्थिति को भी बदल सकता था

रावण इतना शक्तिशाली था, कि  वह ग्रहों की स्थिति को भी बदल सकता था

रावण की शक्ति का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि  वह ग्रहों को भी नियंत्रित कर सकता था. अपने पुत्र मेघनाद के जन्म के दौरान रावण ने ग्रहों को ग्यरहवें घर में रहने का निर्देश दिया। ज्योतिष के अनुसार  ऐसा होने से मेघनाद को अमरत्व प्रदान कर देता। लेकिन राहु और शनि ने उसकी आज्ञा मानने से इनकार कर दिया और बारहवे घर में चले गए. रावण शनि की इस धृष्टता से बहुत  क्रोधित हुआ और उसने शनि को बंधक बना लिया।

6. रावण अपने अंत को भली भांति जानता था

रावण अपने अंत को भली भांति जानता था

ब्रह्मज्ञानी रावण को भली-भांति पता था कि अब उसका अंत हो जाना है. ऐसा माना जाता है कि  उसने श्रीराम से वैर लेना स्वीकार्य था ताकि नारायण के हाथों मर मर उसे राक्षस योनि से मुक्ति मिल सके. जिस मोक्ष को पाने के लिए ऋषि मनीषी हज़ारों वर्ष तपस्या में व्यतीत करते हैं, वह मोक्ष पाने हेतु ही रावण ने श्रीराम से बैर लिया। 

7. क्या आपने कभी सोंचा, रावण के दस सर क्यूँ थे ?

क्या आपने कभी सोंचा, रावण के दस सर क्यूँ थे ?

हालाँकि रामायण के कुछ अन्य प्रारूपों में इस बात का जिक्र नहीं कि रावन के दस सर थे. कुछ का यह कहना है कि रावण की माता ने उसे मोतियों की एक माला दी थी, जिससे रावण के दस सर होने का अहसास होता था. कुछ का यह मानना है कि रावण ने अपने आराध्य शिव को प्रसन्न करने के लिए अपने सर को दस बार काट कर उन्हें अर्पण किया था, और फिर शिव ने आशीर्वाद स्वरूप उसके सभी सर को अलग-अलग स्थापित दिए !

8. रावण को यह नाम बाद में मिला, रावण का नाम शिव ने दिया था

रावण को यह नाम बाद में मिला, रावण का नाम शिव ने दिया था

रावण भगवान् शिव को कैलाश से उठाकर लंका ले जाने की जिद्द पर अड़ा था. वह हठपूर्वक पूरे कैलाश को जड़ से उखाड़ने का प्रयत्न करने लगा. जिसे देखकर शिव बड़े क्रोधित हुए और उन्होंने अंगूठे की नोक को  कैलाश पर टीका दिया. लाख प्रयत्न करने के बावजूद रावण अपने हठ को पूरा नहीं कर सका. भगवान् शंकर का क्रोध समस्त प्रकृति को को विचलित कर रहा था. भगवान् शिव के क्रोध को शांत करने के लिए, रावण ने शिव तांडव स्त्रोत का पाठ किया. जोर जोर से क्षमा याचना करता हुआ रावण, शिव के स्त्रोत से उन्हें प्रसन्न करने में कामयाब हुआ. कहा जाता है, रावण ने अपने नस को वाद्ययन्त्र बना कर यह पाठ किया था. तब भगवान् शिव ने प्रसन्न होकर रावण का नाम रखा.  रावण का अर्थ होता है, वह जो जोर से गरजता हो !



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