रामायण मीमांसा -१ : क्या रामायण के गर्भ में सच यह था ?

क्या राम का आशय ” मन’ से है ? यानि जो हमेशा रमता रहे , कभी भी शांत ना रहने वाला अस्थिर . क्यों ‘राम’ हीं नाम रखा गया ?
क्या दशरथ, का मतलब शरीर  है जिसका पुत्र है मन यानि राम . दश+ रथ = यानि वह रथ जिसे दस द्वारा संचालित किया जाता हो . शरीर को दस इन्द्रियां संचालित करती है . पांच बाह्य इन्द्रियां और पांच कर्म इन्द्रियां.  तो दशरथ के पुत्र राम होने के आशय यह तो नहीं कि शरीर रुपी रामायण में राम मन है .
दशरथ कि तीन रानियों से  क्या आशय है ? मनुष्य में पाए जाने वाली तीन प्रवृतियाँ ” रजोगुण, तमोगुण और सतोगुण ” यानि राजसी, तामसी और सात्विक जीवन. ?
कैकयी क्या तमोगुण का घोतक है , सुमित्रा रजोगुण का तो कौशल्या सतोगुण ?
लंका पर विजय का  अर्थ क्या है ?

इस श्रंखला के प्रकाशन कि आवश्यकता इसलिए भी जान पड़ी क्यों कि आमतौर पर इस गूढ़ विषय पर ना तो कोई चर्चा होती है और ना कोई टिका- टिपण्णी .रामायण के अंतरी भेद को को समझने के लिए रामायण को मतान्धता से बहार बैठ कर  समझना होगा. ‘ माधुरी’ मासिक  पत्रिका  में परम संत तुलसी साहब कि रामायण कि व्याख्या को अप्रमाणिक सिद्ध करने के लिए एक लेख छपा था जिसमे उनके प्रति ऐसे भाव प्रकट किये गए और ऐसे शब्दों का प्रयोग किया गया  जिससे भारी मुर्खता और ओछा  होना टपकता है. रामायण वास्तव में योग कि पुस्तक है . योग का वर्णन न सीधा साधा ना करके कथा के रूप में किया गया है. सीधे रूप में क्यूं नहीं ? इसका उतर यहीं है कि जनता उस समय की, उस विषय को अपनाने के लिए आम तौर पर तैयार नहीं. कडवी औषधि  मीठे के साथ सहज में खा जाते हैं .
इतिहास में धर्मान्धता के कितने उदहारण भरे पड़े है.खगोल शास्त्र  में लोक मत के विपरीत जब यह मालूम हुआ कि सूर्य कि परिक्रमा पृथ्वी करती है तो लोग नाराज़ हो गए और प्रणेता को प्राणों कि पड़  गयी . फकीर मंसूर ने जब ‘अनलहक’ यानि ‘अहम् ब्रह्मास्मि ‘ कहा तो उसे सूली पर चढ़ा दिया गया .
तुलसीदास  के साथ भी ऐसा हीं हुआ. इसका वर्णन घट रामायण में है जिसको उन्होंने अपने दुसरे जन्म में जब वह तुलसी के नाम से प्रसिद्ध हुए, प्रकट किया तो जनता नाराज़ हो गयी. तब रामायण को जो घट रामायण का रूप दिया था, गायब करना पड़ा और साधारण कथा के रूप में राम चरित मानस कि रचना की. मगर जो बातें कहना चाहते थे वह अप्रकट रूप से हीं कह गए. उन्ही अप्रकट बातों यानि रामायण के गूढ़ रहस्य को इस श्रंखला के अन्दर प्रस्तुत  किया जायेगा. निचे लिखा दोहा उपर्युक्त बातों कि तसदीक हीं नहीं, बल्कि तुलसी दस का असल जीवन, मत, ध्येय इत्यादि का सूक्ष्म रूप से परिचय होगा .
” तुलसी कहत  बताई अपनी उत्पति मति विधि ‘
सुधि सत्संगति लार , जग जब से तन में सीढ़ी ‘
कोई ऐसी बात नहीं जो अध्यात्म मार्ग में व्याख नहीं पा सके या यूँ कहें संत मत में वैज्ञानिक रीती से ना समझाई जा सके. अब ‘बिंद्राबन’ सहबद पर विचार कीजिये. बिंद्राबन का शुद्ध रूप वृंदावन है. वह स्थान है जहाँ वृंदा (तुलसी ) के वन खड़े हैं. वृंदा का अपभ्रंश ‘बिंद्रा’ हुआ. उसका अपभ्रंश बिंदा भी है. बिंदाबन का अर्थ है तन यानि जो बिंदु से बना है. संत भाषा शाश्त्र के कैदी नहीं . वे जानते हैं कि वृन्दावन श्री कृष्ण कि क्रीडा स्थली है. परन्तु जब उन्होंने कुल कृष्ण लीला का अंतरी अर्थ योगभाय्स में घटाया तो कहा –
मन है कृष्ण, इन्द्रियां गोपी
लीला भोग विकार
कामादिक सब बल ग्वाल संग
बिंद्राबन तन करत खिलार
( राधास्वामी साहब )
राम चरित मानस के उतर कांड के २६ वें दोहे के राज्याभिषेक के प्रसंग के समय लिखा गया है :–
सुनि खगेश तेहिं अवसर ब्रह्मा शिव मुनिवृन्द
चढ़ी विमान आये सब सुर देखन सुखकंद
(काकभुशुण्ड ने कहा कि हे गरुड़ ! सुना उस समय ब्रह्मा शिव जी तथा ऋषि समूह और सब देवता विमानों में चढ़ कर सुखदम श्री राम को देखने आये )
ब्रह्मा , विष्णु तथा शिव यह त्रिदेव हैं. ऊपर के दोहे से स्पस्ट है कि विष्णु नहीं आये. क्यों  ? इसलिए कि उस समय राम को विष्णु ने अपने हीं बराबर समझा. स्वयं अपने हीं स्तुतु करने क्यूं आते? अपने मुंह अपनी तारीफ कैसे ?
यह मात्र इस विषय का परिचय था . आगे रामायण के प्रत्केय चरण कि वैज्ञानिक व्याख्या कि जाएगी  . उपर्युक्त सामग्री विभिन्न ग्रंथों और संतदास महेश्वरी के पुस्तक रामायण के गूढ़ रहस्य पर आधारित है .

5 Comments

  1. rashmi prabha

    बहुत बढ़िया लिखा है 

  2. ऐतिहासिक तथ्यों पर अपनी कल्पनाशक्ति का अनावश्यक लबादा पहनाया गया है इस आलेख में. रामायण एक झूठा ग्रंथ है इसका प्रमाण महाभारत है जिसमें राम की पूरी कथा है और वही महाभारत के नायक हैं. कृष्ण केवल खलनायक की भूमिका में है. महाभारत के हिन्दी अनुवादों में राम शब्द को बलराम, परशुराम आदि करके राम को महाभारत से लुप्त किया गया है, ज़रा गौर से पढ़िए महाभारत के मूलपाठ को.

    • kanishka kashyap

      आपने तो पुरा इतिहास हीँ बदल डाला. रामायण त्रेता युग की बात है और किशन द्वापर युग की. ऐसे मेँ आप इन युगोँ की अवधारणा को भी गलत बातायेँगे. जब अवतार गलत, युग विभाजन गलत तो क्या सच है आपके नज़र मेँ.
      राम और क्रिष्ण दो अलग अवतार हैँ. इनकी लीलास्थली अलग-अलग है. रामायण और महाभारत का एक होने का कोई प्रमाण हो तो रखेँ. मैने रामायण और महाभारत दोनो पढी है. और गीता हर रोज पढता हूँ. मुझे पढने मेँ अवश्य भुल हुई होगी. ! मार्गदर्शन करेँ>

  3. —राम, दशरथ, रानियां आदि का तात्विक-अध्यात्म अर्थ ीक ही लगाया है, प्रत्येक भौतिक कथा का कवि के मानस में आध्यात्मिक-तात्विक भाव भी रहता है, जिसे समाज़ में स्थापना हेतु व रचता है।—परन्तु रमता शब्द का आप उल्टा अर्थ लगा रहे हैं—रमने का अर्थ है-स्थिर होना , शान्त, प्रक्रितिस्थ ; जो राम का( मन का) मूल गुण होना चाहिये।
    —रामायण-महाभारत तो हमने भी ्पढी है—राम बन्सल जो कह रहे हैं, वैसा कुछ नहीहै ।
    —हां, एक प्राचीन मूल ब्रहद महाभारत भी है,जिसमें राम-क्रष्ण ही नहीं समस्त भारत का इतिहास है ।
    —- वेदों में अवश्य क्रष्ण को यमुनाकी उपत्यकाओं में राज्य करने वाला एक -दस्यु बताया है, जिससे देव ,इन्द्र का युद्ध होता रहता था एवम जीत हार होती रहती थी । यह आपसी रन्ज़िस व ऊंच-नीच के घोष हो सकते हैं ;क्योंकि क्रिष्ण यादवों–चरवाहों के अपेक्षाक्रत निच्च वन्श -स्थित थे, इन्द् प्राचीन उच्च देव वन्श का सरदार, जिसे बाद में क्रिष्ण ने अ्न्त में हराकर सामान्य जन के राज्य की स्थापना की।( गोवर्धन ्पर्वत धारण कथा सार)।

  4. anju tiwari

    it’s too interesting.apne to aisa knowledge diya jo vakai me mujhe kahi se nahi mil sakta tha

Leave a Reply